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11वीं सदी से चला आ रहा सदियो पुरानी परम्परा कजली मेला को निगल गया कोरोना

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यूपी न्यूज एक्सप्रेस

ब्यूरो-महोबा सुलेमान खान

 

महोबा/ आल्हा ऊदल के पौरूष तथा वीर गाथायें सदियो पुराने कजली मेले को भी वैश्विक कोरोना जैसी महामारी का ग्रहण लग गया है। 11वीं सदी मे आल्हा ऊदल तथा दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान के मध्य चंदेल कालीन कीरत सागर के तट पर भीषण युद्ध हुआ था। दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान तथा महोबा नरेश परमादिदेव सेनानायक आल्हा ऊदल तथा मलखान आदि योद्धाओ के मध्य हुए युद्ध मे पृथ्वीराज चैहान के जेष्ठ पुत्र ताहर और 22 बेटे सहित सैकड़ो सैनिक मारे गये थे तथा महोबा नरेश परमादिदेव का छोटा बेटा रणजीत, भतीजा अभई भी शहीद हुआ था। तभी से आल्हा ऊदल की यादगार मे कजली मेले का आयोजन होता चला आ रहा है, कीरत सागर के तट पर भुजरिया विसर्जन और मेले का आयोजन परमा के रोज तथा दोज के दिन आल्हा ऊदल के गुरू अमरा की तपोस्थली गुखार पहाड़ के भूतल मे स्थित शिवताण्डव, का कालभैरव मंदिर प्रागण मे मेले का आयोजन किया जाता रहा है। हवेली दरवाजा प्रागण मे युद्ध मे शहीदो की यादगार मे मेले का आयोजन होता रहा है। कुछ वर्ष पूर्व तथा कथित समाजसेवियो की कूटनीति के चलते शासन प्रशासन से मिलकर मेले को कीरत सागर के तट तक ही सीमित कर दिया था। हालाकि नगर पालिका परिषद द्वारा उक्त परम्पराओ का निर्वाहन उपरोक्त तीनो स्थानो पर किया जाता रहा है। दोज के दिन गुखार पहाड़ के भूतल पर मेला और दंगल का आयोजन होता रहा है।

वैश्विक महामारी के चलते दो वर्ष से कजली मेले का आयोजन आयोजको द्वारा शासन प्रशासन के आदेश पर स्थगित कर दिया गया है। चूकि महोबा का कजली मेला बुंदेलखण्ड का बहुचर्चित था। हर वर्ष कजली मेले का लुप्त लेने के लिए लाखो की भीड़ चंदेल कालीन सरोवर कीरत सागर के तट पर एकत्र होती थी एक माह पूर्व से कीरत सागर के तट पर झूले तथा सर्कस आदि के तम्बू तन जाते थे। कजली मेले के अवसर पर आल्हा, ऊदल, गुरू अमरा, चंदेल नरेश परमादिदेव आदि योद्धाओ की संजीव झाकियो का प्रर्दशन होता आ रहा है। सदियो वर्ष पुरानी चली आ रही परम्परा पर कोरोना काल के चलते शासन प्रशासन द्वारा रोक लगाये जाने से मेला दर्शको मे मायूसी छायी हुई है।

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