यूपी विधानसभा चुनाव में किसानों की नाराजगी का भारी खामियाजा  भुगतना पड़ेगा भाजप को :  केके शर्मा – UP News Express

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 यूपी विधानसभा चुनाव में किसानों की नाराजगी का भारी खामियाजा  भुगतना पड़ेगा भाजप को :  केके शर्मा

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मुंबई-श्रीकेश चौबे/  राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्री के के शर्मा ने कहा है कि  भाजपा को यूपी विधान सभा चुनाव में किसानों की नाराजगी का भारी खामियाजा  भुगतना पड़ेगा. सोमवार को एक विशेष बातचीत में श्री शर्मा ने कहाकि  डीजल पेट्रोल की बढ़ी कीमतें, छुट्टा जानवरों से किसानों की फसलों को हो रहे नुकसान और किसानों की समस्या के चलते बीजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. इसलिए  चुनावों में भाजपा की  पराजय निश्चित है.  किसान बीजेपी से काफी नाराज हैं, यही वजह है कि बीजेपी के नेता किसानों के घरों में जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं.
श्री शर्मा ने कहा है कि  कृषि कानून ,डीजल पेट्रोल की बढ़ी कीमतें, छुट्टा जानवरों से किसानों की फसलों को हो रहे नुकसान के चलते बीजेपी के नेताओं को किसानों की भारी नाराजगी झेलनी पड़ रही है. उन्होंने कहा है कि देश की कुल जीडीपी में 17 फीसदी योगदान देने वाले कृषि क्षेत्र पर लगभग 50 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से रोजगार के लिये आश्रित है। ऐसे में देश की कुल आबादी में लगभग आधी हिस्सेदारी वाले किसानों की नाराजगी भाजपा के लिये मुसीबत का सबब बन सकती है। सरकार के दावों एवं मंशा पर किसान आंदोलन ने सवालिया निशान लगा दिया है।उन्होंने कहाकि बड़े बड़े दावे तो किये जा रहे हैं लेकिन क्या किसानों के लिये की जा रही घोषणाओं और योजनाओं का सही से क्रियान्वयन भी हो रहा है, यह बड़ा सवाल बनकर उभरा है।  किसानों के लिये मोदी सरकार में की गई घोषणाएं महज घोषणा बनकर ही रह गईं। सरकारी योजनाएं धरातल पर नहीं पहुंच पा रहीं।

बता दें कि केन्द्र सरकार सितंबर माह में 3 नए कृषि विधेयक लाई थी, जिन पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद वे कानून बन चुके हैं. लेकिन किसानों को ये कानून रास नहीं आ रहे हैं. उनका कहना है कि इन कानूनों से किसानों को नुकसान और निजी खरीदारों व बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा. किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म हो जाने का भी डर है.विभिन्न राज्यों के कई किसान और किसान संगठन लगातार तीनों कृषि कानूनों को विरोध कर रहे हैं. बता दें कि किसानों के अलावा केन्द्र सरकार के अंदर भी इन बिलों पर समर्थन हासिल नहीं हुआ और राजग के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने भी विरोध में खुद को राजग से अलग कर लिया. नतीजा यह रहा कि केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया.

आंदोलनकारी किसान संगठन केंद्र सरकार से तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं और इनकी जगह किसानों के साथ बातचीत कर नए कानून लाने को कह रहे हैं. उन्हें आंशका है कि लाए गए नए कानूनों कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुकसान किसानों को होगा. लेकिन केंद्र सरकार साफ कर चुकी है कि किसी भी कीमत पर कृषि कानून को न तो वापस लिया जाएगा और न ही उसमें कोई फेरबदल किया जाएगा. किसानों की 5 प्रमुख मांगें इस तरह हैं…
– तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाए क्योंकि ये किसानों के हित में नहीं है और कृषि के निजीकरण को प्रोत्साहन देने वाले हैं. इनसे होर्डर्स और बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा.
– एक विधेयक के जरिए किसानों को लिखित में आश्वासन दिया जाए कि एमएसपी और कन्वेंशनल फूड ग्रेन खरीद सिस्टम खत्म नहीं होगा.
– किसान संगठन कृषि कानूनों के अलावा बिजली बिल 2020 को लेकर भी विरोध कर रहे हैं. केंद्र सरकार के बिजली कानून 2003 की जगह लाए गए बिजली (संशोधित) बिल 2020 का विरोध किया जा रहा है. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस बिल के जरिए बिजली वितरण प्रणाली का निजीकरण किया जा रहा है. इस बिल से किसानों को सब्सिडी पर या फ्री बिजली सप्लाई की सुविधा खत्म हो जाएगी.
– चौथी मांग एक प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत खेती का अवशेष जलाने पर किसान को 5 साल की जेल और 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.
– प्रदर्शनकारी यह भी चाहते हैं कि पंजाब में पराली जलाने के चार्ज लगाकर गिरफ्तार किए गए किसानों को छोड़ा जाए.

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