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दहेज प्रथा समाज के लिए अभिशाप

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आनंद शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार

वैसे तो दहेज प्रथा का इतिहास काफी पुराना है। समाज में यह प्रथा सदियों से चली आ रही है। उत्तर वैदिक काल में सबसे पहले वस्तु के रूप में इसका प्रचलन शुरू हुआ। उस समय कन्या के घर वाले उसकी शादी के समय वर को कुछ वस्तुएँ उपहार में देते थे। लेकिन इस वस्तु के बारे में पहले से न तो कुछ बताया जाता था, और न ही वर पक्ष की तरफ से इसकी मांग की जाती थी। वैदिक काल के बाद मध्यकाल में दहेज को स्त्री धन के रूप में जाना जाने लगा। उस समय कन्या का पिता अपनी हैसियत और इच्छा अनुसार कुछ उपहार देकर कन्या को अपने घर से विदा करता था। मगर इसके लिए कन्या के पिता पर किसी प्रकार का कोई दबाव नही होता था। ध्यान रहे कि कन्या पक्ष बेटी की विदाई के समय उसे कुछ वस्तुएँ उपहार स्वरूप देकर इसलिए विदा करता था, ताकि बुरे वक़्त में बेटी और उसके घर वाले इसका उपयोग कर सकें। वर पक्ष की तरफ से इसके लिए भी कोई दबाव नहीं होता था। कन्या का पिता अपनी खुशी से वस्तुएँ देकर उसे विदा करता था। कालांतर में यह प्रचलन बन गया। अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है। आधुनिक काल में वर पक्ष की तरफ से धन-दौलत, पैसा, गाड़ी और बहुमूल्य सामान कन्या के पिता पर दबाव बना कर मांगा जाता है। कन्या पक्ष की हैसियत न होते हुए भी बेटी के सुखमय जीवन के लिए पिता को मजबूर होकर दहेज देना पड़ता है। दहेज न देने पर बारात लौटा दी जाती है। कई बार तो ऐन वक़्त पर शादियाँ रद्द हो जाती हैं। लालच इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि दहेज के लिए ससुराल वाले लड़कियों की हत्या तक कर देते हैं। कभी-कभी तो दहेज उत्पीड़न से तंग आकर लड़कियां खुद आत्महत्या कर लेती हैं।
गौरतलब है कि दहेज का प्रचलन हमेशा से उच्च जातियों में रहा। उच्च जातियों की नकल करके दहेज की यह बीमारी दूसरी जातियों तक पहुंची। अगड़ी जातियों के बराबर अपनी सामाजिक हैसियत बनाने के लिए अन्य जातियों ने भी दहेज प्रथा का तेजी से अनुसरण किया। जाहिर है कि सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ जाने के कारण दहेज लेकर शादी करना, अब सभी जातियों और धर्मों में सामान्य बात हो गई है। इस बीमारी से अब कोई जाति या धर्म अछूता नहीं रहा। इसने सबको अपनी चपेट में ले लिया है। हालत यह है कि जो व्यक्ति शादियों में खूब पैसा खर्च करके और मूल्यवान वस्तुएं उपहार स्वरूप दहेज में देकर अपनी बेटी को विदा करता है, समाज से उसको ज्यादा सम्मान और महत्व मिलता है। समाज में दहेज प्रथा के बढ़ते प्रभाव के मौजूदा दौर में, अमीर व्यक्ति अपनी बेटी की शादी में बहुत सारा पैसा खर्च करके और वर पक्ष को कीमती वस्तुएँ दहेज के रूप में भेंट करके, अपना और अपनी कन्या का मान सम्मान तो अवश्य बढ़ा लेता है, लेकिन गरीब परिवारों की लड़कियों के लिए यह मुसीबत बन जाती है। गरीब पिता को उसकी आर्थिक हैसियत न होते हुए भी कर्ज लेकर दहेज देने के लिए उसे मजबूर होना पड़ता है। निश्चित ही दहेज प्रथा बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है। इससे कई बुराइयों का जन्म होता है। इसके चलते माता-पिता को अपनी सुंदर, सुशील, गुणवान और शिक्षित लड़की का विवाह अशिक्षित, कुरूप और ज्यादा उम्र के लड़के के साथ करना पड़ जाता है। बेमेल विवाह के चलते लड़की का पूरा दाम्पत्य जीवन दुखमय हो जाता है। कई बार मन पसंद जीवन साथी न मिलने के कारण लड़कियां मौत को गले लगा लेती हैं।
यह दु:खद है कि दहेज के इस दानव के भय से अवैध अल्ट्रा साउंड क्लीनिकों में हर रोज लाखों लड़कियां माँ की कोख में ही मार दी जाती हैं। एक अध्ययन के अनुसार प्रत्येक 1000 नवजात लड़कियों में से बमुश्किल 766 लड़कियां ही समाज में जीवित रह पाती हैं। इसके लिए दहेज कुप्रथा मुख्य रूप से जिम्मेदार है। एक जानकारी के मुताबिक भारत में करीब 20 महिलाओं की मौत हर रोज दहेज के कारण होती है। आश्चर्य इस बात पर है कि महिलाओं को तेजी से निगल रही दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए समाज में कोई ठोस पहल होती दिख नहीं रही। उल्टे भारी भरकम दहेज और मोटी धनराशि देकर धड़ल्ले से वर खरीदा जा रहा है। समाज में पैसे वाले अपनी बेटी की खुशी के लिए मुह मांगा पैसा और दहेज देकर बेरोक-टोक शादियाँ कर रहे हैं। इसके लिए दूल्हा खरीदने और बेचने वाले इसकी दर भी तय कर दिए हैं। एक अनुमानित रिपोर्ट के मुताबिक आई.ए.एस. लड़का 50 लाख से 1 करोड़ रुपए, आई.पी.एस. 50 से 80 लाख, डॉक्टर 40 से 60 लाख, सॉफ्टवेयर इंजीनियर 25 से 30 लाख, बैंक कर्मी 15 से 20 लाख, प्राथमिक विद्यालय शिक्षक 5 से 10 लाख, चपरासी 5 लाख और बेरोजगार स्नातक 2 से 3 लाख रुपए में खरीदे जाते हैं। ऐसा नहीं है कि दहेज प्रथा को रोकने के लिए देश में कानून नहीं है। 1 जुलाई 1961 में दहेज के खिलाफ पूरे देश में दहेज निषेध अधिनियम अस्तित्व में आया। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि दहेज प्रथा को रोकने के लिए जो कानून बनाए गए हैं, वे अभी तक पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हुए हैं। दहेज प्रथा को रोकने के लिए बनाए गए कानून के मुताबिक दहेज लेने-देने या लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और साथ ही 15 हजार रुपए के जुर्माना का प्रावधान है। दहेज के लिए महिला का उत्पीड़न करने, पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा अवैधानिक रूप से संपत्ति या कीमती वस्तुओं की मांग करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता है। लड़की के स्त्री धन को उसे सौंपने से इनकार करने पर पति और ससुराल वालों को धारा 406 के तहत तीन साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों हो सकता है। यदि किसी लड़की की विवाह के 7 साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है, और यदि प्रमाणित कर दिया जाता है कि मृत्यु से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, तो ऐसी स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी के तहत लड़की के पति और ससुराल वालों को कम से कम सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। ध्यान रहे कि विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार भारतीय समाज में दहेज प्रथा अभी भी बेरोक-टोक जारी है। पिछले 48 वर्षों में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में हुई करीब 40 हजार शादियों के अध्ययन के पश्चात यह पाया गया कि 95 फीसदी शादियाँ दहेज लेकर की गईं। यह स्थिति तब है जब देश में दहेज को रोकने के लिए पिछले 60 साल से कानून अस्तित्व में है।
इस संबंध में विगत दिनों दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान की तरफ से की गई ऐतिहासिक पहल निश्चित ही स्वागत योग्य है। पिछले 14 जुलाई को दहेज को लेकर नागरिकों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से उन्होंने तिरुअनंतपुरम स्थित राजभवन में एक दिन का उपवास रखा। केरल के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होने के कारण उन्होंने विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले छात्रों के अभिभावकों से इस बात के लिए शपथ पत्र लेने को कहा है कि वे अपने बच्चों की शादियों में न दहेज लेंगे न देंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने उपाधि ग्रहण करने वाले छात्रों से भी बगैर दहेज की शादी करने के लिए उनसे भी शपथ पत्र लेने को कहा है। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में नियुक्त किए जाने वाले कर्मचारियों से भी इस बारे में शपथ पत्र देने को कहा गया है। गौर करने की बात है कि महात्मा गांधी ने कहा था कि दहेज लेकर शादी करने वाले न सिर्फ अपनी शिक्षा और देश को बदनाम करते हैं, बल्कि ऐसा करके वे समूची महिला जाति का अपमान करते हैं। यह सच है कि भारत के पुरुष प्रधान समाज ने अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए महिलाओं को सदैव चहारदिवारी के अंदर रखा। पुराने जमाने में शिक्षा के अभाव के कारण महिलाएं पूरी तरह पुरुषों पर निर्भर रहती थीं। लेकिन जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का प्रसार हुआ, लड़कियां भी उच्च शिक्षित होने लगीं। लड़कियां आज हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे चल रही हैं। इसके बावजूद भी दहेज का दानव इनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। लड़कियां कितनी भी उच्च शिक्षित और योग्य हो जाएँ, अभी भी बगैर दहेज के उनकी शादियाँ नहीं हो पा रही हैं। भारत को यदि महाशक्ति बनना है, तो समाज से दहेज प्रथा को हर हालत में समाप्त करना होगा। बीमार या विकृत समाज से सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता। दहेज प्रथा समाज की एक विकृति और अभिशाप है। इसके रहते देश कभी तरक्की नहीं कर सकता है। दहेज प्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए भारत के भविष्य युवा पीढ़ी को आगे आना होगा। निश्चित रूप से इस कुप्रथा के उन्मूलन में युवा वर्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन, इसके लिए उन्हें सर्वप्रथम स्वयं यह संकल्प लेना होगा कि वे अपनी शादियों में दहेज नहीं लेंगे। साथ ही उन्हें अपने परिजनों, रिश्तेदारों, परिचितों और दोस्तों को भी बगैर दहेज के शादी करने के लिए प्रेरित करना होगा। इसके अलावा दहेज प्रथा के खिलाफ समाज में भी सघन जागरूकता अभियान चलाना पड़ेगा। इस कार्य में समाजसेवी संस्थाएं और सामाजिक संगठन भी महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।
मनुस्मृति के वचन में कहा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जिस स्थान पर स्त्रियों की पूजा की जाती है और उनका सत्कार किया जाता है, उस स्थान पर देवता सदा निवास करते हैं और प्रसन्न रहते हैं। भारतीय संस्कृति में नारी को देवी, लक्ष्मी और दुर्गा की तरह पूजा जाता है। यह सच है कि नारी के चलते ही मनुष्य आज यहाँ तक पहुँच सका है। जिस नारी की सदियों से पूजा की गई, जिसे सम्मान की दृष्टि से सदा देखा गया, जिसे घर, परिवार और खानदान की इज्जत माना गया, तुच्छ दहेज के लिए उसका शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न एवं उसकी हत्या करना महापाप है। निश्चित ही समाज में व्याप्त इस कुप्रथा को हर हालत में समाप्त किया जाना आवश्यक है। हालांकि इसे कानून के जरिए रोक पाना मुश्किल है, लेकिन समाज में जागरूकता फैला कर और हर व्यक्ति को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करके इस बुराई पर विजय पाया जा सकता है। इस बात में संदेह नहीं कि दहेज प्रथा के समाप्त होने से समाज में महिलाएं इज्जत और सम्मान के साथ जी सकेंगी। इसलिए इसके खात्मे के लिए सभी को संकल्पबद्ध होकर प्राण-प्रण से प्रयास करने की आवश्यकता है। निश्चित रूप से सामूहिक प्रयास से ही इस बुराई का खात्मा किया जा सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं )

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